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प्लास्टिक बैग: ग्राहक नहीं जिम्मेदार

हलवाई की दुकान से नमकीन खरीदकर घर पहुंचे। प्लास्टिक बैग से नमकीन निकालकर खाई, तो देखा कि प्लास्टिक बैग का रंग नमकीन पर आ गया है। हलवाई के पास पहुंचे, तो उसने कहा कि हम तो रोज ऐसे ही बेचते हैं। किसी और ने तो आज तक शिकायत नहीं की। इसे खा लो, कुछ नहीं होगा।

ऐसा किसी के साथ भी हो सकता है। दरअसल, प्लास्टिक के इस्तेमाल को लेकर समाज में जागरूकता न होने की वजह से इसका इस्तेमाल हमारी जिंदगी में बढ़ता जा रहा है। यह सस्ती, आसान व आसानी से मिलने वाली तो है, लेकिन पर्यावरण के लिए बेहद नुकसानदायक भी है। आज हमारे कूड़े का बड़ा हिस्सा प्लास्टिक कचरे के रूप में होता है। इसे अगर दूसरे कूड़े से अलग न किया जाए तो इसके गंभीर नतीजे हो सकते हैं।

कुछ समय पहले दिल्ली सरकार ने प्लास्टिक बैग के दिल्ली में इस्तेमाल पर रोक लगा दी थी। इसे लेकर आम जनता में असमंजस बना हुआ है। प्लास्टिक बैग के इस्तेमाल को लेकर क्या हैं नियम, अधिकार और जिम्मेदारी, आइए जानते हैं :

नियम क्या हैं
दिल्ली में कोई भी व्यापारिक प्रतिष्ठान कस्टमर को प्लास्टिक के कैरी बैग में सामान डालकर नहीं दे सकता।

प्लास्टिक बैग बेचना, स्टोर करना और दुकानों द्वारा उन्हें इस्तेमाल में लाना मना है।

अगर कस्टमर को दुकान से निकलते वक्त प्लास्टिक कैरी बैग इस्तेमाल के लिए कोई अथॉरिटी रोकती है, तो इसे कस्टमर नहीं, बल्कि दुकानदार की गलती माना जाएगा।

सरकार को विज्ञापनों व दूसरे प्रचार माध्यमों से जनता को जागरूक बनाना चाहिए, जिससे लोग प्लास्टिक के इस्तेमाल से होने वाले नुकसान को जानकर उनके विकल्पों को अपना सकें।

सरकार को प्लास्टिक बैग की बजाय कागज, जूट व ऐसी ही दूसरी चीजों से बने बैग्स को प्रोत्साहित करना चाहिए।

आपकी जिम्मेदारी और अधिकार
आम नागरिक की जिम्मेदारी है कि वह प्लास्टिक के कैरी बैग को रिजेक्ट करे और जूट व कपड़े के बैग का इस्तेमाल करे।

आप अपने घर में उपलब्ध पुराने प्लास्टिक कैरी बैग को सामान लाने-ले जाने में इस्तेमाल कर सकते हैं।

रंगीन प्लास्टिक बैग का इस्तेमाल कभी न करें। इसमें मेटलिक ऐडिटिव्स होते हैं, जो हमारी सेहत के लिए बेहद खतरनाक हैं।

प्राकृतिक रूप से गलने वाले कूड़े को अलग रखें और प्लास्टिक के कचरे या बैग इत्यादि को अलग।

अगर आपके घर के पास कोई प्लास्टिक रीसाइक्लिंग फैक्ट्री चल रही है तो आप अपने एरिया के एसडीएम या दिल्ली पलूशन कंट्रोल कमिटी को लिखित रूप में शिकायत कर सकते हैं। इसे तुरंत बंद कराना उनकी जिम्मेदारी है।

ये भी जानें

प्लास्टिक को कभी खत्म (नष्ट) नहीं किया जा सकता।

दिल्ली में अधिकृत रीसाइक्लिंग फैक्ट्रियों की तुलना में कई गुना ज्यादा फैक्ट्रियां अवैध रूप से चल रही हैं। नियम यह है कि प्लास्टिक प्रॉडक्ट्स के निर्माता दिल्ली पलूशन कंट्रोल कमिटी में रजिस्ट्रेशन कराए बिना फैक्ट्री नहीं चला सकते।

प्लास्टिक शहर की सुंदरता को खराब करेती है। नालों व सीवर को जाम कर देती है। अगर यह प्लास्टिक कूड़े में मिली हो तो इसे जलाए जाने पर जहरीली गैस निकलती हैं। यह प्लास्टिक कूड़े की प्रोसेसिंग को भी प्रभावित करती है।

आमतौर पर फल-सब्जी या परचून दुकानदारों द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे प्लास्टिक बैग तय स्टैंडर्ड के मुताबिक नहीं होते।

क्या होगी सजा
प्लास्टिक के कैरी बैग को बेचने, स्टोर करने या उसमें सामान डालकर कस्टमर को देने पर एक लाख रुपए का जुर्माना व पांच साल की सजा हो सकती है।

हेल्पलाइन
अगर आपको रेजिडेंशल एरिया में कोई प्लास्टिक रीसाइक्लिंग फैक्ट्री नजर आए या कोई दुकानदार किसी भी तरह के प्लास्टिक कैरी बैग का इस्तेमाल कर रहा हो तो आप अपने एरिया के एसडीएम, राशन दफ्तर के एफएसओ, एमसीडी या एनडीएमसी के स्वास्थ्य अधिकारी, खाद्य अपमिश्रण विभाग के इंस्पेक्टर आदि को सूचित कर सकते हैं। आपकी शिकायत पर कार्रवाई करना उनकी जिम्मेदारी है।

आप दिल्ली पलूशन कंट्रोल कमिटी को सीधे लिख सकते हैं। ऐसी चीजों को रोकना इसी विभाग की जिम्मेदारी है। आप कमिटी के चेयरमैन या मेंबर सेक्रेटरी को इस पते पर लिख सकते हैं :

दिल्ली पलूशन कंट्रोल कमिटी, चौथी मंजिल, आईएसबीटी बिल्डिंग, कश्मीरी गेट, दिल्ली-110006

फोन : 011-23869389, 23860389

फैक्स : 011- 23392034, 23866781

दिल्ली सरकार के पर्यावरण विभाग को भी लिख सकते हैं।

पता है :
डिप्टी सेक्रेटरी (एनवायरनमेंट), कमरा नंबर सी-604, छठी मंजिल, सी-विंग, दिल्ली सचिवालय, आईपी एस्टेट, नई दिल्ली- 110002, फोन : 011-23392028

दिल्ली सरकार की ‘आपकी सुनवाई’ शिकायत व्यवस्था में 155345 पर फोन करके या इंटरनेट से भी शिकायत दर्ज करा सकते हैं।

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FIR दर्ज न हो तो

करोलबाग में रहने वाले अपूर्व अग्रवाल को फेज रोड पहुंचने पर पता चला कि उनकी जेब से मोबाइल फोन गायब है। फौरन बस से उतरकर उन्होंने पीसीओ से अपने नंबर को डायल किया। एक – दो बार घंटी जाने के बाद मोबाइल बंद हो गया। मोबाइल फोन चोरी की रिपोर्ट दर्ज कराने के लिए वह करोलबाग पुलिस स्टेशन पहुंचे , लेकिन ड्यूटी पर तैनात पुलिस अफसर ने उन्हें पहाड़गंज थाने जाने के लिए कहा। पहाड़गंज पुलिस स्टेशन से उन्हें फिर करोलबाग पुलिस स्टेशन भेज दिया। दोनों पुलिस स्टेशन के अधिकारी घटना स्थल को अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर होने की बात कहकर उन्हें घंटों परेशान करते रहे। थक – हारकर उन्होंने झूठ का सहारा लिया और पुलिस को बताया कि मोबाइल करोलबाग में चोरी हुआ है। तब जाकर पुलिस ने एफआईआर दर्ज की।

पुलिस अधिकारियों को जनता से शिष्टतापूर्वक व्यवहार करने के लिए प्रशिक्षण दिया जाता है। अगर पुलिस एफआईआर दर्ज करने में आनाकानी करे , दुर्व्यवहार करे , रिश्वत मांगे या बेवजह परेशान करे , तो इसकी शिकायत जरूर करें।

क्या है एफआईआर
किसी अपराध की सूचना जब किसी पुलिस ऑफिसर को दी जाती है तो उसे एफआईआर कहते हैं। यह सूचना लिखित में होनी चाहिए या फिर इसे लिखित में परिवतिर्त किया गया हो। एफआईआर भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता 1973 के अनुरूप चलती है। एफआईआर संज्ञेय अपराधों में होती है। अपराध संज्ञेय नहीं है तो एफआईआर नहीं लिखी जाती।

आपके अधिकार

– अगर संज्ञेय अपराध है तो थानाध्यक्ष को तुरंत प्रथम सूचना रिपोर्ट ( एफआईआर ) दर्ज करनी चाहिए। एफआईआर की एक कॉपी लेना शिकायत करने वाले का अधिकार है।

– एफआईआर दर्ज करते वक्त पुलिस अधिकारी अपनी तरफ से कोई टिप्पणी नहीं लिख सकता , न ही किसी भाग को हाईलाइट कर सकता है।

– संज्ञेय अपराध की स्थिति में सूचना दर्ज करने के बाद पुलिस अधिकारी को चाहिए कि वह संबंधित व्यक्ति को उस सूचना को पढ़कर सुनाए और लिखित सूचना पर उसके साइन कराए।

– एफआईआर की कॉपी पर पुलिस स्टेशन की मोहर व पुलिस अधिकारी के साइन होने चाहिए। साथ ही पुलिस अधिकारी अपने रजिस्टर में यह भी दर्ज करेगा कि सूचना की कॉपी आपको दे दी गई है।

– अगर आपने संज्ञेय अपराध की सूचना पुलिस को लिखित रूप से दी है , तो पुलिस को एफआईआर के साथ आपकी शिकायत की कॉपी लगाना जरूरी है।

– एफआईआर दर्ज कराने के लिए यह जरूरी नहीं है कि शिकायत करने वाले को अपराध की व्यक्तिगत जानकारी हो या उसने अपराध होते हुए देखा हो।

– अगर किसी वजह से आप घटना की तुरंत सूचना पुलिस को नहीं दे पाएं , तो घबराएं नहीं। ऐसी स्थिति में आपको सिर्फ देरी की वजह बतानी होगी।

– कई बार पुलिस एफआईआर दर्ज करने से पहले ही मामले की जांच – पड़ताल शुरू कर देती है , जबकि होना यह चाहिए कि पहले एफआईआर दर्ज हो और फिर जांच – पड़ताल।

– घटना स्थल पर एफआईआर दर्ज कराने की स्थिति में अगर आप एफआईआर की कॉपी नहीं ले पाते हैं , तो पुलिस आपको एफआईआर की कॉपी डाक से भेजेगी।

– आपकी एफआईआर पर क्या कार्रवाई हुई , इस बारे में संबंधित पुलिस आपको डाक से सूचित करेगी।

– अगर थानाध्यक्ष सूचना दर्ज करने से मना करता है , तो सूचना देने वाला व्यक्ति उस सूचना को रजिस्टर्ड डाक द्वारा या मिलकर क्षेत्रीय पुलिस उपायुक्त को दे सकता है , जिस पर उपायुक्त उचित कार्रवाई कर सकता है।

– एएफआईआर न लिखे जाने की हालत में आप अपने एरिया मैजिस्ट्रेट के पास पुलिस को दिशा – निर्देश देने के लिए कंप्लेंट पिटिशन दायर कर सकते हैं कि 24 घंटे के अंदर केस दर्ज कर एफआईआर की कॉपी उपलब्ध कराई जाए।

– अगर अदालत द्वारा दिए गए समय में पुलिस अधिकारी शिकायत दर्ज नहीं करता या इसकी प्रति आपको उपलब्ध नहीं कराता या अदालत के दूसरे आदेशों का पालन नहीं करता , तो उस अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई के साथ उसे जेल भी हो सकती है।

– अगर सूचना देने वाला व्यक्ति पक्के तौर पर यह नहीं बता सकता कि अपराध किस जगह हुआ तो पुलिस अधिकारी इस जानकारी के लिए प्रश्न पूछ सकता है और फिर निर्णय पर पहुंच सकता है। इसके बाद तुरंत एफआईआर दर्ज कर वह उसे संबंधित थाने को भेज देगा। इसकी सूचना उस व्यक्ति को देने के साथ – साथ रोजनामचे में भी दर्ज की जाएगी।

– अगर शिकायत करने वाले को घटना की जगह नहीं पता है और पूछताछ के बावजूद भी पुलिस उस जगह को तय नहीं कर पाती है तो भी वह तुरंत एफआईआर दर्ज कर जांच – पड़ताल शुरू कर देगा। अगर जांच के दौरान यह तय हो जाता है कि घटना किस थाना क्षेत्र में घटी , तो केस उस थाने को ट्रांसफर हो जाएगा।

– अगर एफआईआर कराने वाले व्यक्ति की केस की जांच – पड़ताल के दौरान मौत हो जाती है , तो इस एफआईआर को Dying Declaration की तरह अदालत में पेश किया जा सकता है।

– अगर शिकायत में किसी असंज्ञेय अपराध का पता चलता है तो उसे रोजनामचे में दर्ज करना जरूरी है। इसकी भी कॉपी शिकायतकर्ता को जरूर लेनी चाहिए। इसके बाद मैजिस्ट्रेट से सीआरपीसी की धारा 155 के तहत उचित आदेश के लिए संपर्क किया जा सकता है।———————————————————-

सरकारी अफसर रिश्वत मांगे तो

आलोक कुमार ने केंद्र सरकार के एक विभाग में टेंडर भरा। सबसे ज्यादा रेट होने के कारण उनका नाम लिस्ट में सबसे ऊपर है, यह जानकर उन्हें खुशी हुई। कुछ दिन विभाग के लेटर का इंतजार किया। जब लेटर नहीं मिला तो भाग-दौड़ शुरू की। मालूम हुआ कि एक अधिकारी के पास फाइल पिछले एक महीने से पेंडिंग पड़ी हुई है। जब उस अधिकारी से मिले तो उसने काम करने के बदले मोटी रकम की मांग कर डाली। अधिकारी की मांग पूरी कर पाना उनके लिए मुमकिन नहीं था। जब किसी भी तरह बात नहीं बनी तो उन्होंने सरकार के विभिन्न शिकायत मंचों पर शिकायत की। लेकिन शिकायत पर कार्रवाई तो दूर, उनका सिक्युरिटी अमाउंट भी वापस नहीं मिला।

सरकारी दफ्तरों में भ्रष्टाचार की शिकायतें आम हैं। इनकी रोकथाम के लिए 2003 में ‘सेंट्रल विजिलेंस कमिशन’ बिल पास किया गया। आइए जानते हैं, क्या है सेंट्रल विजिलेंस कमिशन (सीवीसी) और कब कर सकते हैं यहां शिकायत:

अधिकार क्षेत्र में आनेवाले मंत्रालय/विभाग

केंद्र सरकार के मंत्रालय/विभाग, केंद्र सरकार के सभी पीएसयू, नैशनलाइज्ड बैंक, रिजर्व बैंक, नाबार्ड और सिडबी, सरकारी बीमा कंपनियां, पोर्ट ट्रस्ट व डॉक लेबर बोर्ड आदि। इसके अलावा दिल्ली, चंडीगढ़, दमन एवं दीव, पांडिचेरी आदि समेत सभी केंद्र शासित प्रदेश।

जांच के दायरे में आनेवाले अधिकारी

सीवीसी अपने अधिकार क्षेत्र में आनेवाले संगठनों में तैनात अधिकारियों की कुछ श्रेणियों के खिलाफ ही जांच कर सकता है, जो इस प्रकार हैं:

केंद्रीय सरकारी मंत्रालय/विभाग: ग्रुप ए और उससे ऊपर के अधिकारी (अंडर सेक्रेटरी और इससे ऊपर के अधिकारी)

पब्लिक सेक्टर यूनिट (पीएसयू): बोर्ड लेवल और उससे दो लेवल नीचे तक के अधिकारी

पब्लिक सेक्टर के बैंक: स्केल V और इससे ऊपर के अधिकारी

रिजर्व बैंक, सिडबी और नाबार्ड: ग्रेड डी या इससे ऊपर के अधिकारी

बीमा क्षेत्र: असिस्टेंट मैनेजर और इससे ऊपर के अधिकारी

जीवन बीमा निगम: सीनियर डिविजनल मैनेजर और इससे ऊपर के अधिकारी

स्वायत्त निकाय: 8700 रुपये या ज्यादा बेसिक सैलरी पानेवाले अधिकारी

पोर्ट ट्रस्ट/डॉक लेबर बोर्ड: 10,750 रुपये या ज्यादा बेसिक सैलरी पानेवाले अधिकारी

सीवीसी के काम

– ऐसे किसी भी लेन-देन के मामले में जांच करना या कराना, जिसमें केंद्र सरकार के अधीन अधिकारी के शामिल होने का शक हो।

– केंद्र सरकार के मंत्रालयों/विभागों और उसके नियंत्रण में आनेवाले दूसरे संगठनों के सतर्कता और भ्रष्टाचार निवारण संबंधी कामों की सामान्य जांच और निगरानी करना।

– विजिलेंस संबंधी मामलों में स्वतंत्र और निष्पक्ष सलाह देना।

– भ्रष्टाचार के किसी भी आरोप को सामने लाना और उस पर उचित कार्रवाई की सिफारिश करना।

– सीबीआई और एनफोर्समेंट डायरेक्ट्रेट के अलावा दिल्ली की स्पेशल सेल के उच्च अधिकारियों की चयन समितियों की अध्यक्षता करना।

– सीवीसी के अधिकार क्षेत्र में आनेवाले अधिकारियों और संगठनों के खिलाफ की गई भ्रष्टाचार संबंधी शिकायतों की जांच सीबीआई या संबंधित संगठन के चीफ विजिलेंस ऑफिसर द्वारा कराई जाती है।

– टेंडरों के खिलाफ शिकायतों के बारे में सीवीसी संबंधित विजिलेंस ऑफिसर के माध्यम से जांच कराता है, लेकिन टेंडर प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं करता। सीवीओ की रिपोर्ट के आधार पर ही सीवीसी मामले में आगे कार्रवाई करता है।

कैसे करें शिकायत

– सीवीसी को सीधे पत्र लिखकर शिकायत की जा सकती है। सीवीसी की वेबसाइट http://www.cvc.nic.in पर भी शिकायत दर्ज की जा सकती है। शिकायत करने से पहले यह जांच लें कि जिस संगठन या अधिकारी के खिलाफ शिकायत करनी है, वह सीवीसी के अधिकार क्षेत्र में आता है या नहीं।

– ‘लोकहित प्रकटीकरण और मुखबीर संरक्षण (पब्लिक इंटरेस्ट डिस्क्लोजर ऐंड इनफॉर्मर प्रॉटेक्शन)’ के तहत की गई शिकायत सिर्फ डाक से ही भेजी जानी चाहिए। लिफाफे पर मोटे शब्दों में ‘पीआईडी पीआई’ या ‘पर्दाफाश’ लिखा होना चाहिए।

– जो शिकायतकर्ता अपनी पहचान गुप्त रखना चाहते हैं, आयोग उनकी पहचान छुपाकर रखता है।

– जिन शिकायतों को जांच के लायक पाया जाता है, उनमें शिकायतकर्ता को एक कंप्लेंट नंबर दिया जाता है। ऐसी शिकायतों का स्टेटस विभाग की वेबसाइट पर कंप्लेंट ऑप्शन में जाकर चेक किया जा सकता है।

ये भी जानें

– शिकायत सीधे सीवीसी को भेजी जानी चाहिए। बहुत से अधिकारियों/विभागों को भेजी गई शिकायतों पर सामान्यत: सीवीसी कार्रवाई नहीं करता।

– गुमनाम या गलत नामों से की गई शिकायतों पर भी सीवीसी कार्रवाई नहीं करता। अपना नाम-पता जरूर दें।

– राज्य सरकारें और प्राइवेट संगठन व संस्थाएं सीवीसी के अधिकार क्षेत्र में नहीं आते। राज्य सरकार के खिलाफ शिकायतें राज्यों के स्तर पर ‘स्टेट विजिलेंस कमिश्नर’ या लोकायुक्त को ही भेजें।

हेल्पलाइन

अगर केंद्र सरकार का कोई सीनियर अफसर आपसे रिश्वत की मांग करे या अपने पद का बेजा इस्तेमाल करे तो आप इसकी शिकायत सीवीसी को कर सकते हैं। पता हैः

सेंट्रल विजिलेंस कमिशन, सतर्कता भवन, ए ब्लॉक, जीपीओ कॉम्प्लेक्स, आईएनए, नई दिल्ली – 110023

फोन: 011-2465 1001-08, फैक्स: 011-2465 1010, ई-मेल: vigilance@nic.in ,
वेबसाइट: http://www.cvc.nic.in

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आम पुलिसकर्मी नहीं काट सकते चालान

 

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